रायण हेठे प्रभुजी बैट्ठा, समवसरण नी रीते,प्रथम केवलज्ञान पा म्या, आदिनाथ अणी प्रीते;कोटि देव परिवा रशुं, देशना दे जगनाथ,चरण कमल नी सेवा करतां, मळे अविचल साथ।
4. चतुर्थ चैत्यवंदन: साढबा माता (शैलपुत्री / अंबिका माता)
Shree Shantrunjay giriraj Yatra Five Chaityavandans - jainsite
"श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र, दीठे दुर्गति वारे;भाव धरीने जे चढे, तेने भवपार उतारे।अनंत सिद्धनो आहे ठाम, सकल तीर्थनो राय;पूर्व नवानु ऋषभदेव, ज्यां थव्या प्रभु पाय।" palitana 5 chaityavandan in hindi full
जय शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र, दीठे दुर्गति वारे।भाव धरी ने जे चढे, तेने भव पार उतारे।अनंत सिद्धानो अहे ठाम, सकल तीर्थनो राय।पूर्व नवनू ऋषभदेव, ज्यां ठाव्या प्रभु पाय।सूरजकुंड सोहामनो, कवड्याक्ष अभिराम।नाभिराया कुल मंडनो, जिनवर करूँ प्रणाम।
शुक्ल ध्यान ध्याता अमल, केवल वर लीध।"
(यहाँ एक नवकार मंत्र गिनें और खमासमण दें) समवसरण नी रीते
आदिनाथ के लाडले, गणाधीश प्रधान,तुम सम और न जगत में, सिद्ध कूट कल्यान।शत्रुंजय महिमा बढ़ी, तुम दर्शन से देव,'पुंडरीक' गुरुदेव की, नित करूँ मैं सेव।। 2 ।।
रायण वृक्ष के नीचे प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ प्रभु के प्राचीन चरण (पगला) स्थित हैं। महत्व:
यात्रा की शुरुआत पर्वत की तलहटी से होती है, जिसे 'जय तलेटी' कहा जाता है। यहाँ पहला चैत्यवंदन किया जाता है। आदिनाथ अणी प्रीते
पांच सौ धनुष की देहडी, प्रभुजी परम दयाल;
संक्षिप्त चैत्यवंदन विधि (सभी स्थानों के लिए)
पांच कोडि मुनींद साथे, अनशण तिहां कीध,शुक्ल ध्यान ध्याता अमल, केवल वर लीध। (२)
रायण हेठे पादुका, पूजीने आनंदो।